Pranamya Sagar
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9. वैयावृत्यकरण भावना (सोलहकारण भावना)

pravachanOct 31, 2025

Audio वैयावृत्यकरण भावना यह शरीर तो रहा अचेतन, दुर्गन्धित है अशुचि निधान चर्म मात्र से शोभ रहा है, भीतर रुधिर-मांस-मल खान। यदि नितान्त एकान्त रूप से, ऐसा तन तू मान रहा फिर तू वैयावृत्य करे क्यों, क्या चेतन पहचान रहा?॥1॥ --o-- भूल रहा तू जो मुनि जन हैं, रत्नत्रय से नित्य पवित्र त…