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जीवन परिचय:–
परम पूज्य आचार्य प्रवर ज्ञानसागर जी महाराज महान तपस्वी, बाल ब्रह्मचारी, कवि ह्रदय, संस्कृत और हिंदी में अनेक महाकाव्यों की रचना करने वाले, स्वाध्याय प्रेमी, लेखनी के धनी, करुणा और वात्सल्य की मूर्ति, शांति प्रिय, बहुत विनय शील और संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान थे। जीवन के अंतिम समय में उन्होंने अपने शिष्य को ही अपना गुरु बना लिया और उनसे समाधि देने के लिए प्रार्थना की। आचार्य प्रवर ज्ञानसागर जी महाराज, आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के गुरु और मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज के दादा गुरु (गुरु के गुरु) थे।
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जन्म और परिवार:–
आचार्य प्रवर ज्ञानसागर जी महाराज का जन्म 24 अगस्त 1897, भाद्रपद कृष्ण एकादशी को राजस्थान के सीकर जिले के राणोली गांव में हुआ था। उनका गृहस्थ अवस्था का नाम “भूरामल” जी था। उन्हें “शांति कुमार” के नाम से भी पुकारा जाता था। उनकी माता का नाम श्रीमती घृतवरी देवी जी और पिता का नाम श्री चतुर्भुज छावड़ा जी था। भूरामल जी पांच भाई थे, जिनमें उनका नंबर दूसरा था। उनका परिवार एक सादा जीवन जीने वाला मध्यम वर्गीय परिवार था।
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स्वभाव:–
बचपन से भूरामल जी बहुत सरल स्वभाव के थे। वे बहुत मधुर वाणी वाले थे और कम बोलते थे। पढ़ाई में वे बहुत होशियार थे और ज्यादा से ज्यादा ज्ञान प्राप्त करने में उनकी रुचि रहती थी। वे सभी के प्रति विनय भाव रखते थे और निस्वार्थ भाव से सेवा करते थे। दया, करुणा, परोपकार के गुण उनके अंदर भरे हुए थे। जैन धर्म के प्रति बचपन से ही उनके अंदर लगाव और आकर्षण था। उनका रंग गोरा और शरीर पतला दुबला था।
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संघर्ष का जीवन:–
भूरामल जी का जीवन बचपन से ही संघर्षों से घिर गया था। जब वे सिर्फ 10 वर्ष के थे, उनके पिता का देहांत हो गया। बड़े भाई भी उस समय सिर्फ 12 वर्ष के थे। पिता के देहान्त के कारण परिवार की आर्थिक स्थिति खराब हो गई थी। भूरामल जी ने उस समय तक गांव के स्कूल में ही शिक्षा प्राप्त की थी, उसको भी छोड़ना पड़ा।
उनके बड़े भाई छगनलाल जी घर की आर्थिक स्थिति संभालने के लिए काम की खोज में बिहार के “गया” चले गए। कुछ समय बाद भूरामल जी भी अपने बड़े भाई के पास चले गए और वहां एक जैन व्यवसायी के यहां काम सीखने लगे। इस समय आर्थिक तंगी के कारण उनकी पढ़ाई छूट चुकी थी। एक दिन वे स्याद्वाद महाविद्यालय वाराणसी के कुछ छात्रों से मिले तो उनके मन में भी वहां जाकर शिक्षा प्राप्त करने की इच्छा हुई, पर आर्थिक तंगी के कारण उस समय उनकी यह इच्छा पूरी नहीं हो पायी।
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उच्च शिक्षा के लिए प्रयास:–
भूरामल जी आगे शिक्षा प्राप्त करना चाहते थे। अभी उनकी उम्र सिर्फ 15 वर्ष ही थी, वे शिक्षा प्राप्त करने के लिए वाराणसी चले गए। वहां पर स्याद्वाद महाविद्यालय में अध्ययन करना शुरू कर दिया। धन की कमी थी इसलिए अपना और पढ़ाई का खर्चा चलाने के लिए वे शाम को गंगा के घाट पर गमछे बेचने लगे। वे स्वाभिमानी थे इसलिए उन्होंने किसी से धन नहीं मांगा बल्कि अपने को आत्मनिर्भर बना लिया।
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जैन व्याकरण, न्याय, साहित्य का अध्ययन:–
वाराणसी में उन्होंने जैन आचार्यों के द्वारा लिखे गए दर्शन, व्याकरण, न्याय और साहित्य के ग्रंथों का खूब अध्ययन किया। ज्ञान प्राप्त करने में उनकी हमेशा बहुत रूचि रहती थी। वहां पर उन्होंने अपना उद्देश्य ज्ञान प्राप्त करना रखा, ना कि सिर्फ परीक्षा पास करना। वहां जिस किसी भी शिक्षक के पास अवसर मिलता, अलग-अलग ग्रंथों का वे खूब अध्ययन करते। इस तरह उन्होंने सभी ग्रंथों का अध्ययन पूरा करके, क्रीन्स कॉलेज काशी से शास्त्री की परीक्षा पास कर ली। इसके साथ ही स्याद्वाद महाविद्यालय से जैन दर्शन और संस्कृत साहित्य की उच्च शिक्षा भी प्राप्त कर ली।
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अध्ययन काल में लिए गए संकल्प:–
जब भूरामल जी अध्ययन कर रहे थे तो उस समय उन्हें जैन आगम में साहित्य और काव्य की कुछ कमी महसूस हुई। उन्होंने शिक्षा प्राप्ति के बाद काव्य और साहित्य की कमी को दूर करने का संकल्प किया। इसके साथ ही उन्होंने आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत धारण कर, जैन साहित्य एवं धर्म के प्रचार और सेवा में लगे रहने का निश्चय किया। यही नहीं, उन्होंने कठिन प्रयास और दूसरे लोगों के सहयोग से जैन व्याकरण और न्याय के ग्रंथों को काशी विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में भी शामिल कराया।
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शिक्षा पूरी होने के बाद निस्वार्थ सेवा:–
शिक्षा पूरी करने के बाद वे अपने गांव वापस आ गए। उन्होंने अपनी डिग्री को कमाई का माध्यम नहीं बनाया। गांव में ही उन्होंने जैन बच्चों को निस्वार्थ भाव से पढ़ाना शुरू कर दिया और उसके लिए कोई शुल्क नहीं लिया, जबकि उस समय उनके घर की आर्थिक स्थिति भी अच्छी नहीं थी। उन्होंने अपने गांव में ही बड़े भाई के साथ मिलकर व्यवसाय शुरू किया जिससे छोटे भाइयों का पालन पोषण किया जा सके और घर की आर्थिक स्थिति ठीक की जा सके।
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साहित्य लेखन शुरू किया:–
कुछ समय बाद उन्होंने व्यवसाय की जिम्मेदारी छोटे भाइयों को सौंप दी और अपने को अध्ययन, अध्यापन और लेखन में पूरी तरह लगा दिया। वह दिन में अधिकांश समय अध्ययन और लेखन में लगे रहते। राजस्थान के रामगढ़ में उन्हें संस्कृत पढ़ाने के लिए बुलाया गया, वहां भी उन्होंने कोई वेतन नहीं लिया और निस्वार्थ भाव से छात्रों को संस्कृत का अध्ययन कराया। इसके साथ-साथ, वे जैन आगम में साहित्य और काव्य की कमी को दूर करने के लिए संस्कृत और हिंदी के ग्रंथों की रचना करते रहे।
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संयम पथ पर बढ़े कदम:–
ज्ञान प्राप्ति की इच्छा उनके मन में हमेशा रहती थी जिसके कारण वह हमेशा नए-नए ग्रंथों के अध्ययन और लेखन में लगे रहते थे। जैसे-जैसे उनका चिंतन – मनन बढ़ता गया, उनके मन में वैराग्य भाव भी बढ़ने लगा। ब्रह्मचर्य व्रत तो वे अध्ययन काल में ही ले चुके थे। 26-6-1947 को, अजमेर में उन्होंने आचार्य श्री वीरसागर जी महाराज से सातवीं प्रतिमा के रूप में ब्रह्मचर्य व्रत को धारण किया।
अब ब्रह्मचारी भूरामल जी के कदम तेजी से संयम पथ पर बढ़ने लगे। ब्रह्मचर्य व्रत के 2 वर्ष बाद उन्होंने अपने घर का त्याग कर दिया। 25-4-1955 को उन्हें मुजफ्फरनगर (उत्तर प्रदेश) के मंसूरपुर में आचार्य श्री वीरसागर जी महाराज से क्षुल्लक दीक्षा मिली। अब उनको क्षुल्लक श्री “ज्ञान भूषण” जी के नाम से जाना जाने लगा। 2 वर्ष बाद 1957 में, उनको आचार्य श्री देशभूषण जी महाराज द्वारा ऐलक दीक्षा प्रदान की गई।
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मुनि दीक्षा:–
22-6-1959 को खनिया जी की नसिया, जयपुर राजस्थान में आचार्य शिवसागर जी महाराज ने ऐलक ज्ञान भूषण जी को मुनि दीक्षा प्रदान की और उनको “ज्ञानसागर” नाम दिया। संयम पथ पर आगे बढ़ते हुए मुनि श्री ज्ञानसागर जी महाराज निरंतर ग्रंथों के स्वाध्याय, अध्यापन और लेखन में लगे रहे। वे संघ में अन्य मुनि, आर्यिका, क्षुल्लक, ब्रह्मचारी सभी को ग्रंथों का अध्ययन कराते रहते थे। उनके इसी ज्ञान और रुचि के कारण उनको संघ का उपाध्याय बना दिया गया।
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आचार्य पद और चारित्र चक्रवर्ती पद:–
7-2-1969 को अजमेर (राजस्थान) के नसीराबाद में जैन समाज ने मुनि श्री ज्ञानसागर जी महाराज को आचार्य पद पर विभूषित किया। आचार्य पद रहते हुए ज्ञानसागर जी महाराज ने अनेक शिष्यों को मुनि दीक्षा दी। इनमें से एक, आज के प्रसिद्ध महान तपस्वी आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज भी हैं। आचार्य पद पर रहते हुए श्री ज्ञानसागर जी महाराज का स्वाध्याय, ज्ञान अध्ययन खूब चलता रहा। वे अपने सभी शिष्यों को अधिकांश समय स्वाध्याय, अध्ययन कराते और इस तरह उनके ज्ञान को बढ़ाते रहते थे। 20-10-1972 को आचार्य श्री ज्ञानसागर महाराज के प्रति बहुत अधिक श्रद्धा और भक्ति भाव से भरकर जैन समाज ने उनको चारित्र चक्रवर्ती पद से सुशोभित किया।